वोट चोर, गद्दी छोड़! लेकिन गरीब का ‘कल’ कभी नहीं आता!

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एक गरीब आदमी सुबह काम की तलाश में निकलता है। शाम को खाली हाथ लौटता है तो घर में बच्चे पूछते हैं, “पापा, आज क्या लाए?” वह मुस्कराकर कह देता है, “कल लाऊँगा।” यह वही आदमी है जो चुनाव के समय नेताओं से पूछता है, “साहब, हमारे लिए क्या करेंगे?” नेता भी मुस्कराकर कहते हैं, “आपकी जिंदगी बदल देंगे।” फर्क सिर्फ इतना है कि गरीब का ‘कल’ कभी नहीं आता, जबकि नेता का ‘कल’ पाँच साल बाद फिर चुनाव बनकर आ जाता है।
आज देश में नारा गूँज रहा है—‘वोट चोर, गद्दी छोड़!’ विपक्ष मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की माँग कर रहा है और चुनावी प्रक्रिया में कथित गड़बड़ियों को लेकर सवाल उठा रहा है। चुनाव की निष्पक्षता लोकतंत्र की बुनियाद है। यदि मतदाता सूची या मतदान की प्रक्रिया में अनियमितता के आरोप हैं, तो उनकी निष्पक्ष जाँच होनी चाहिए। लेकिन इस पूरे विवाद के बीच एक सवाल और है, जो शायद किसी मंच से उतनी ऊँची आवाज में नहीं पूछा जाएगा—गद्दी बदलने के बाद उस गरीब की जिंदगी में क्या बदलेगा, जो हर चुनाव के बाद भी गरीब ही रह जाता है?
विडंबना देखिए। अपने जिले के किसी दफ्तर में काम कराने के लिए यदि किसी गरीब को रिश्वत देनी पड़े, अस्पताल में इलाज के लिए जेब खाली करनी पड़े, या सरकारी योजना का लाभ पाने के लिए महीनों चक्कर काटने पड़ें, तो उसकी शिकायत अक्सर फाइलों में दम तोड़ देती है। स्थानीय भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने में जोखिम है, सामने वाला अधिकारी या रसूखदार व्यक्ति रोज उसी इलाके में मिल सकता है। लेकिन राष्ट्रीय मंच पर खड़े होकर नारा लगाना अपेक्षाकृत आसान है। वहाँ भीड़ में चेहरा छिप जाता है; मोहल्ले में शिकायत करने पर आदमी की पहचान उजागर हो जाती है। शायद इसीलिए व्यवस्था के छोटे दरवाजों पर हमारी आवाज धीमी और बड़े मंचों पर बुलंद हो जाती है।
यह भी कम दिलचस्प नहीं कि हम बिकाऊ मीडिया पर गुस्सा करते हैं, लेकिन चुनाव के समय अपना वोट बेचने वाले लोगों पर अक्सर चुप रहते हैं। पत्रकार बिके तो लोकतंत्र खतरे में, मतदाता बिका तो मजबूरी! यह सच है कि गरीबी में कुछ सौ रुपये भी बड़ी रकम होते हैं और किसी भूखे परिवार को नैतिकता का भाषण देना क्रूरता हो सकती है। लेकिन सवाल उस व्यवस्था से भी है, जिसने नागरिक की जरूरतों को इतना सस्ता और उसके वोट को इतना महँगा राजनीतिक हथियार बना दिया। जब पेट खाली हो, तब लोकतंत्र की किताब में लिखे आदर्श रोटी की जगह नहीं लेते। मगर जब हर चुनाव में रोटी के नाम पर वोट लिया जाए और हर चुनाव के बाद रोटी फिर सवाल बनकर खड़ी हो जाए, तब मजबूरी धीरे-धीरे राजनीतिक कारोबार का स्थायी हिस्सा बन जाती है।
नेताओं को भीड़ चाहिए, मीडिया को खबर, प्रभावशाली लोगों को चर्चा और राजनीतिक दलों को सत्ता। सबके पास अपनी-अपनी जरूरत है। जरूरत सिर्फ उस आदमी की है, जिसके पास नौकरी नहीं, महँगी दवा खरीदने के पैसे नहीं, बच्चों की फीस भरने का भरोसा नहीं। वह रैली में जाता है तो किसी के लिए समर्थक, तस्वीर में भीड़ का हिस्सा और भाषण में जनता कहलाता है। रैली खत्म होने के बाद वही आदमी फिर अपने मालिक से आधे दिन की मजदूरी काट लेने की विनती करता है। लोकतंत्र के मंच पर वह देश का मालिक है; रोजमर्रा की जिंदगी में कई बार अपने ही अधिकारों के लिए उसे दूसरों के सामने हाथ जोड़ने पड़ते हैं।
राहुल गांधी हों या सत्ता पक्ष के नेता—जनता को यह पूछने का अधिकार है कि उनका संघर्ष आखिर किसके जीवन में क्या बदलेगा। चुनावी अनियमितताओं पर सवाल उठाना जरूरी है, लेकिन रोजगार, महँगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य और भ्रष्टाचार पर जवाब माँगना भी उतना ही जरूरी है। विपक्ष यदि केवल सत्ता की कमियों को गिनाता है, तो उसे अपनी वैकल्पिक योजना भी बतानी होगी। और सत्ता यदि विपक्ष के सवालों को राजनीति कहकर टालती है, तो उसे अपने जवाब तथ्यों के साथ देने होंगे। लोकतंत्र में किसी दल की नीयत का प्रमाण उसके नारों से नहीं, उसके काम और जवाबदेही से मिलता है।
सबसे दुखद बात यह है कि गरीब आदमी अक्सर अपनी गरीबी को अपनी किस्मत मानने लगता है। वह यह भूल जाता है कि उसकी बदहाली हमेशा उसकी व्यक्तिगत असफलता नहीं होती; उसमें नीतियों, अवसरों, संस्थाओं और सार्वजनिक फैसलों की भी भूमिका होती है। जब उसे बार-बार बताया जाता है कि उसकी समस्याओं का कारण कोई दूसरा समुदाय, कोई दूसरा दल या कोई दूसरा नेता है, तो वह अपनी वास्तविक समस्याओं का हिसाब माँगना छोड़ सकता है। यही राजनीति की सबसे सुविधाजनक स्थिति है—जनता आपस में बहस करती रहे और उससे चुने गए लोग जवाब देने की जरूरत से मुक्त हो जाएँ।
आंदोलन जरूरी हैं, लेकिन हर आंदोलन का हिसाब भी जरूरी है। भीड़ कितनी जुटी, इससे पहले यह पूछा जाना चाहिए कि उस भीड़ की जिंदगी में क्या बदला। कितने युवाओं को रोजगार मिला, कितने परिवारों को इलाज मिला, कितने दफ्तरों में रिश्वत का डर घटा और कितने बच्चों का भविष्य थोड़ा सुरक्षित हुआ? जो लोग जनता को सत्ता तक पहुँचने की सीढ़ी बनाते हैं, उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि सीढ़ी पर चढ़ने वाला ऊपर पहुँच जाता है, लेकिन सीढ़ी वहीं रह जाती है।
हो सकता है, एक दिन गरीब आदमी फिर किसी रैली से लौटे। रास्ते में कोई उससे पूछे, “क्या हुआ, इस बार किसकी सरकार बनेगी?” वह शायद हँसकर कहे, “यह तो नेता बताएँगे।” फिर कुछ देर चुप रहकर जोड़ दे, “कोई यह भी बता दे कि मेरे घर में अगली बार चूल्हा किसकी सरकार बनने से जलेगा?”
उस दिन शायद उसकी हँसी में छिपा दर्द किसी नारे से ज्यादा सच्चा होगा। क्योंकि लोकतंत्र की सबसे बड़ी विफलता केवल यह नहीं कि किसी का वोट चोरी हो जाए; यह भी है कि नागरिक अपने जीवन पर अपने अधिकार को ही धीरे-धीरे भूलने लगे। गद्दी किसे मिलेगी, यह चुनाव तय करता है। लेकिन आम आदमी को इंसान की तरह जीने का हक कब मिलेगा—इसका जवाब किसी नारे में नहीं, जवाबदेह राजनीति में मिलना चाहिए।

लेखक : सी एम जैन